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विदेश में साइबर ठगी और बंधक बनाए गए बिहार के 1600 युवा, जांच एजेंसियों ने शुरू की बड़ी कार्रवाई

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बिहार के करीब 1600 युवा विदेश में साइबर ठगी और बंधक बनाए जाने के मामले में फंसे बताए जा रहे हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय हैं और कई ट्रैवल एजेंसियों पर जांच शुरू कर दी गई है।

पटना/आलम की खबर:बिहार से एक बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां विदेश में बेहतर नौकरी और ऊंचे वेतन का सपना देखकर गए लगभग 1600 युवा अब तक अपने घर वापस नहीं लौटे हैं। इन सभी के वीजा की अवधि समाप्त हो चुकी है, लेकिन इनके वापस न आने से केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियां गंभीर चिंता में हैं। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि इन युवाओं को विदेश में साइबर ठगी और अवैध गतिविधियों में जबरन शामिल किया गया हो सकता है।

केंद्र सरकार के इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) से मिले इनपुट के बाद बिहार की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने इस पूरे मामले की जांच तेज कर दी है। जांच एजेंसियों के अनुसार यह एक संगठित अंतरराष्ट्रीय रैकेट हो सकता है, जो बेरोजगार युवाओं को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आकर्षक वेतन और नौकरी का झांसा देकर फंसाता है।

जांच में सामने आया है कि इस रैकेट के सदस्य पहले युवाओं से ऑनलाइन संपर्क करते हैं और फिर उन्हें टूर एंड ट्रैवल एजेंसियों के माध्यम से थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस और म्यांमार जैसे देशों में भेजा जाता है। वहां पहुंचते ही कई मामलों में उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए जाते हैं और उन्हें साइबर ठगी करने वाले कॉल सेंटरों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

इन युवाओं से अक्सर उनकी ही भाषा में भारत के लोगों को निशाना बनाकर ऑनलाइन ठगी करवाई जाती है। खासकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोगों को फोन कॉल, मैसेज और डिजिटल फ्रॉड के जरिए निशाना बनाया जाता है। यह पूरा नेटवर्क एक सुनियोजित तरीके से काम करता है, जिसमें पीड़ित युवाओं को मानसिक और शारीरिक दबाव में रखा जाता है।

पुलिस मुख्यालय के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित जिले गोपालगंज, सीवान, मोतिहारी, बगहा, बेतिया, गया और दरभंगा बताए जा रहे हैं। इन जिलों से बड़ी संख्या में युवा विदेश गए थे, जिनका अब कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिल पा रहा है। प्रशासन अब इन सभी के घरों पर जाकर परिजनों से संपर्क कर भौतिक सत्यापन कर रहा है, ताकि वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके।

इस मामले में एक राहत की बात यह रही कि हाल ही में लगभग 60 नागरिकों को साइबर ठगी के इस चंगुल से मुक्त कराकर भारत वापस लाया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि कुछ लोग अभी भी इस नेटवर्क से बाहर निकाले जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है।

जांच एजेंसियों ने इस पूरे रैकेट में शामिल होने के संदेह में लगभग 39 टूर एंड ट्रैवल एजेंसियों को चिह्नित किया है, जो दिल्ली, एनसीआर और बिहार में सक्रिय हैं। इन एजेंसियों की भूमिका की जांच की जा रही है कि कहीं इन्होंने फर्जी दस्तावेजों और झूठे वादों के आधार पर युवाओं को विदेश तो नहीं भेजा।

आने वाले दिनों में इन एजेंसियों के संचालकों से पूछताछ की जाएगी और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ मानव तस्करी, धोखाधड़ी और साइबर क्राइम से जुड़े गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल बेरोजगारी या विदेश नौकरी का नहीं, बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर मानव तस्करी नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जिसे तोड़ने के लिए बहु-एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।

फिलहाल बिहार पुलिस, EOU और केंद्रीय एजेंसियां मिलकर इस पूरे मामले की गहन जांच कर रही हैं और जल्द ही कई और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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